मुंशी प्रेमचंद जी का जीवन परिचय

प्रेमचंद जी हिंदी और उर्दू के महानतम भारतीय लेखकों में से एक हैं उपन्यास के क्षेत्र में उनके योगदान को देखकर बंगाल के विख्यात उपन्यासकार शरत चद्र चट्टोपाध्याय ने उन्हें उपन्यास सम्राट कहकर संबोधित किया उन्होंने हिंदी कहानी और उपन्यास की ऐसी परंपरा का विकास किया जिसने पूरी सदी के साहित्य का मार्गदर्शन किया।

 प्रेमचंद जी का जन्म 31 जुलाई 1880 को वाराणसी जिले के लमही नामक गांव में एक कायस्थ परिवार में हुआ था उनकी माता माता का नाम तथातथा पिता का नाम अजायब राय था जो लमही गांव में डाक मुंशी थे प्रेमचंद जी की आरंभिक शिक्षा फारसी में हुई जब वे 7 वर्ष के ही थे उनकी मातामाता का निधन हो गया उनका पहला विवाह उन दिनों की परंपरा के अनुसार 15 साल की उम्र में हुआ जो सफल नहीं रहा 16 वर्ष‌ की आयु में उनके पिता का भी देहांत हो गया इस इस कारण उनका प्रारंभिक जीवन संघर्ष में है रहा। उनकी बचपन से ही पढ़ने में बहुत रुचि थी 13 वर्ष की आयु में ही उन्होंने तिलिस्मे होशरूबा पढ़ लिया था। 
वह आर्य समाज से प्रभावित रहे जो उस समय का बहुत बड़ा धार्मिक और सामाजिक आंदोलन था ।उन्होंने विधवा विवाह का समर्थन किया और 1906 में दूसरा विवाह बाल विधवा शिवरानी देवी से किया ।उनकी तीन संताने हुई श्रीपतराव अमृतराय और कमला देवी। मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वे शिक्षा विभाग में एक स्थानीय विद्यालय में शिक्षक नियुक्त हो गए 1910 में इंटर किया और 1919 में b.a. करने के बाद भी शिक्षा विभाग के इंस्पेक्टर के पद पर नियुक्त हुए ।
1910 में उनकी रचना सोजे वतन के लिए उन पर जनता को भड़काने का आरोप लगा सोजे वतन की सभी प्रतियां नष्ट कर दी गई ।सर्वप्रथम प्रेमचंद जी धनपत राय के नाम से लिखते थे ।उनके अजीज दोस्त मुंशी देवनारायण निगम ने उन्हें प्रेमचंद के नाम से लिखने की सलाह दी ।इसके बाद भी प्रेमचंद के नाम से लिखने लगे उन्होंने आरंभिक लेखन जमाना पत्रिका में किया 1921 में असहयोग आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी के सरकारी नौकरी छोड़ देने के आवाहन पर स्कूल इंस्पेक्टर के पद से त्यागपत्र दे दिया ।इसके बाद उन्होंने लेखन को ही अपना व्यवसाय बना दिया जीवन के अंतिम दिनों में गंभीर रूप से बीमार पड़े।लंबी बीमारी के बाद 8 अक्टूबर 1936 को उनका निधन हो गया।

प्रेमचंद आधुनिक हिंदी कहानी के पितामह और उपन्यास सम्राट माने जाते हैं 20 वर्षों की अवधि में उनकी कहानियों के विभिन्न रंग देखने को मिलते हैं।उनसे पहले हिंदी में काल्पनिक और पौराणिक धार्मिक रचनाएं हैं जानी जाती थी पूर्णविराम भारतीय साहित्य                  में चाहे वह दलित साहित्य हो या नारी साहित्य उसकी                जड़ें प्रेमचंद के साहित्य में दिखती हैं प्रेमचंद जी का                    दूसरा उपन्यास प्रेमा नाम से 1960 में प्रकाशित हुआ                  प्रेमचंद नाम से उनकी पहली कहानी बड़े घर की                         बेटी जमाना पत्रिका के दिसंबर 1910 के अंक में                       प्रकाशित हुई उन्होंने मूल रूप से हिन्दी में 1915
से कहानियां लिखना शुरू किया और 1918 से उपन्यास (सेवा सदन) लिखना शुरू किया। प्रेमचंद जी ने कुल तीन सौ कहानियां, लगभग एक दर्जन उपन्यास और कई लेख लिखे। उन्होंने कई नाटक भी लिखे और कुछ अनुवाद कार्य भी किया। प्रेमचनद की कुछ साहित्यिक कृतियों का अंग्रेजी रूसी जर्मन सहित अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ। गोदान उनकी कालजई रचना है कफन उनकी अंतिम कहानी मानी जाती है उन्होंने हिंदी और उर्दू में पूरे अधिकार से लिखा उनकी अधिकांश रचनाएं मूल रूप से उर्दू में लिखी गई हैं लेकिन उनका प्रकाशन हिंदी में पहले हुआ 33 वर्षों के रचनात्मक जीवन में वे साहित्य की ऐसी विरासत गए जो गुणों की दृष्टि से अमूल्य है। और आकार की दृष्टि से असीमित।
कृतियां
प्रेमचन्द की रचना-दृष्टि विभिन्न साहित्य रूपों में प्रवृत्त हुई। बहुमुखी प्रतिभा संपन्न प्रेमचंद ने उपन्यास, कहानी, नाटक, समीक्षा, लेख, सम्पादकीय, संस्मरण आदि अनेक विधाओं में साहित्य की सृष्टि की। प्रमुखतया उनकी ख्याति कथाकार के तौर पर हुई और अपने जीवन काल में ही वे ‘उपन्यास सम्राट’ की उपाधि से सम्मानित हुए। उन्होंने कुल १५ उपन्यास, ३०० से कुछ अधिक कहानियाँ, ३ नाटक, १० अनुवाद, ७ बाल-पुस्तकें तथा हजारों पृष्ठों के लेख, सम्पादकीय, भाषण, भूमिका, पत्र आदि की रचना की लेकिन जो यश और प्रतिष्ठा उन्हें उपन्यास और कहानियों से प्राप्त हुई, वह अन्य विधाओं से प्राप्त न हो सकी। यह स्थिति हिन्दी और उर्दू भाषा दोनों में समान रूप से दिखायी देती है'सेवासदन' (1918) उपन्‍यास से हिंदी उन्‍यास की दुनिया में प्रवेश किया। सेवासदन' एक नारी के वेश्‍या बनने की कहानी है। डॉ रामविलास शर्मा के अनुसार 'सेवासदन' में व्‍यक्‍त मुख्‍य समस्‍या भारतीय नारी की पराधीनता है। इसके बाद किसान जीवन पर उनका पहला उपन्‍यास 'प्रेमाश्रम' (1921) आया। इसका मसौदा भी पहले उर्दू में 'गोशाए-आफियत' नाम से तैयार हुआ था लेकिन 'सेवासदन' की भांति इसे पहले हिंदी में प्रकाशित कराया। 'प्रेमाश्रम' किसान जीवन पर लिखा हिंदी का संभवतः पहला उपन्‍यास है। यह अवध के किसान आंदोलनों के दौर में लिखा गया। इसके बाद 'रंगभूमि' (1925), 'कायाकल्‍प' (1926), 'निर्मला' (1927), 'गबन' (1931),'कर्मभूमि' (1932) से होता हुआ यह सफर 'गोदान' (1936) तक पूर्णता को प्राप्‍त हुआ। रंगभूमि में प्रेमचंद एक अंधे भिखारी सूरदास को कथा का नायक बनाकर हिंदी कथा साहित्‍य में क्रांतिकारी बदलाव का सूत्रपात कर चुके थे। गोदान का हिंदी साहित्‍य ही नहीं, विश्‍व साहित्‍य में महत्‍वपूर्ण स्‍थान है। इसमें प्रेमचंद की साहित्‍य संबंधी विचारधारा 'आदर्शोन्‍मुख यथार्थवाद' से 'आलोचनात्‍मक यथार्थवाद' तक की पूर्णता प्राप्‍त करती है। एक सामान्‍य किसान को पूरे उपन्‍यास का नायक बनाना भारतीय उपन्‍यास परंपरा की दिशा बदल देने जैसा था। सामंतवाद और पूंजीवादके चक्र में फंसकर हुई कथानायक होरी की मृत्‍यु पाठकों के जहन को झकझोर कर रख जाती है। किसान जीवन पर अपने पिछले उपन्‍यासों 'प्रेमाश्रम' और 'कर्मभूमि' में प्रेमंचद यथार्थ की प्रस्‍तुति करते-करते उपन्‍यास के अंत तक आदर्श का दामन थाम लेते हैं। लेकिन गोदान का कारुणिक अंत इस बात का गवाह है कि तब तक प्रेमचंद का आदर्शवाद से मोहभंग हो चुका था।

नाटक


 प्रेमचंद ने संग्राम (1923), कर्बला (1924) और प्रेम की वेदी (1933) नाटकों की रचना की। ये नाटक शिल्‍प और संवेदना के स्‍तर पर अच्‍छे हैं लेकिन उनकी कहानियों और उपन्‍यासों ने इतनी ऊँचाई प्राप्‍त कर ली थी कि नाटक के क्षेत्र में प्रेमचंद को कोई खास सफलता नहीं मिली। ये नाटक वस्‍तुतः संवादात्‍मक           उपन्यास बन गए हैं।


निबंध

प्रेमचंद एक संवेदनशील कथाकार ही नहीं, सजग नागरिक व संपादक भी थे। उन्‍होंने 'हंस', 'माधुरी', 'जागरण' आदि पत्र-पत्रिकाओं का संपादन करते हुए व तत्‍कालीन अन्‍य सहगामी साहित्यिक पत्रिकाओं 'चाँद', 'मर्यादा', 'स्‍वदेश' आदि में अपनी साहित्यिक व सामाजिक चिंताओं को लेखों या निबंधों के माध्‍यम से अभिव्‍यक्‍त किया। अमृतराय द्वारा संपादित 'प्रेमचंद : विविध प्रसंग' (तीन भाग) वास्‍तव में प्रेमचंद के लेखों का ही संकलन है। प्रेमचंद के लेख प्रकाशन संस्‍थान से 'कुछ विचार' शीर्षक से भी छपे हैं। प्रेमचंद के मशहूर लेखों में निम्‍न लेख शुमार होते हैं- साहित्‍य का उद्देश्‍य, पुराना जमाना नया जमाना, स्‍वराज के फायदे, कहानी कला (1,2,3), कौमी भाषा के विषय में कुछ विचार, हिंदी-उर्दू की एकता, महाजनी सभ्‍यता, उपन्‍यास, जीवन में साहित्‍य का स्‍थान आदि।


अनुवाद


प्रेमचंद एक सफल अनुवादक भी थे। उन्‍होंने दूसरी भाषाओं के जिन लेखकों को पढ़ा और जिनसे प्रभावित हुए, उनकी कृतियों का अनुवाद भी किया। 'टॉलस्‍टॉय की कहानियाँ' (1923), गाल्‍सवर्दी के तीन नाटकों का हड़ताल (1930), चाँदी की डिबिया (1931) और न्‍याय (1931) नाम से अनुवाद किया। आजाद-कथा (उर्दू से, रतननाथ सरशार), पिता के पत्र पुत्री के नाम (अंग्रेजी से, जवाहरलाल नेहरू) उनके द्वारा रतननाथ सरशार के उर्दू उपन्‍यास फसान-ए-आजाद का हिंदी अनुवाद आजाद कथा बहुत मशहूर हुआ।

पुरस्कार व सम्मान

प्रेमचंद की स्मृति में भारतीय डाकतार विभाग की ओर से ३१ जुलाई १९८० को उनकी जन्मशती के अवसर पर ३० पैसे मूल्य का एक डाक टिकट जारी किया गया। गोरखपुर के जिस स्कूल में वे शिक्षक थे, वहाँ प्रेमचंद साहित्य संस्थान की स्थापना की गई है। इसके बरामदे में एक भित्तिलेख है जिसका चित्र दाहिनी ओर दिया गया है। यहाँ उनसे संबंधित वस्तुओं का एक संग्रहालय भी है। जहाँ उनकी एक वक्षप्रतिमा भी है। प्रेमचंद की १२५वीं सालगिरह पर सरकार की ओर से घोषणा की गई कि वाराणसी से लगे इस गाँव में प्रेमचंद के नाम पर एक स्मारक तथा शोध एवं अध्ययन संस्थान बनाया जाएगा। प्रेमचंद की पत्नी शिवरानी देवी ने प्रेमचंद घर में नाम से उनकी जीवनी लिखी और उनके व्यक्तित्व के उस हिस्से को उजागर किया है, जिससे लोग अनभिज्ञ थे। यह पुस्तक १९४४ में पहली बार प्रकाशित हुई थी, लेकिन साहित्य के क्षेत्र में इसके महत्व का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसे दुबारा २००५ में संशोधित करके प्रकाशित की गई, इस काम को उनके ही नाती प्रबोध कुमार ने अंजाम दिया। इसका अंग्रेज़ी व हसन मंज़र का किया हुआ उर्दू अनुवाद भी प्रकाशित हुआ। उनके ही बेटे अमृत राय ने कलम का सिपाही नाम से पिता की जीवनी लिखी है। उनकी सभी पुस्तकों के अंग्रेज़ी व उर्दू रूपांतर तो हुए ही हैं, चीनी, रूसी आदि अनेक विदेशी भाषाओं में उनकी कहानियाँ लोकप्रिय हुई हैं। 

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